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                                                                                                                                    प्रथम उद्घोषणा

        पुरातन काल से ही भारतवर्ष और विश्व के प्रमुख स्थानों में तीर्थपति प्रयाग की महत्ता प्रमुख रूप से स्वीकार की जाती रही है। विश्व के सबसे प्राचीन साहित्य वैदिक वाङ्मय में भी प्रयाग के महत्त्व का उल्लेख किया गया है। धर्म और दर्शन तथा भारतीय संस्कृति की दृष्टि से भी प्रयाग की महिमा सर्वोपरि है। प्राचीन काल में भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, वाल्मीकि, विश्वामित्र आदि त्रिकालवेत्ता महर्षियों के नेतृत्व में प्रत्येक वर्ष इस तीर्थस्थल पर विचारकों और मनीषियों का विराट् सम्मेलन आयोजित किये जाने का साक्ष्य पुराणों में प्राप्त होता है। इन सम्मेलनों में मानवता के वैश्विक परिप्रेक्ष्य जैसे गहन विषय पर चिन्तन और विचार-विमर्श होने का उल्लेख भारतीय वाङ्मय में प्राप्त होता है। इस प्रकार धर्म, दर्शन, नीति, राजनीति, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद, योग एवं ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में यह प्रयाग की पुण्यभूमि इन महनीय क्षेत्रों की राजधानी के रूप में जगद्विश्रुत है। अनादिकाल से इस परम्परा का प्रमाण माघमेला, अर्धकुम्भ, कुम्भ और महाकुम्भ के रूप में यहाॅ दृष्टिगोचर होता चला आ रहा है। जिस आयोजन में विना किसी आमंत्रण और निमंत्रण के विश्वभर के करोड़ों लोग स्वतः खिचे चले आने में न केवल गौरव की अनुभूति करते हैं अपितु अपने मानव जीवन के लिए इस लोक और परलोक की सुखमय व्यवस्था हेतु कामना करते हैं। उस परमपावन नगरी के रूप में प्रयाग के माहात्म्य का वर्णन करना संभव नहीं है।

     प्रयाग की इस पुण्यस्थली पर सन् 1887 ई0 का वह परमपुनीत मुहूर्त अनन्तकाल तक चिरस्मरणीय रहेगा जिस क्षण में जगद्विश्रुत महिमामण्डित परम गौरवशाली ज्ञान-विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी विश्व और भारतवर्ष के भविष्य के निर्धारक इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। इस महान् संस्था से ज्ञान-विज्ञान के समस्त क्षेत्रों में एक से एक मूर्धन्य महामनीषियों का प्रादुर्भाव हुआ जिन्हांेने विश्व में अपनी महामेधा से इस देश की महिमा को देदीप्यमान किया। ज्ञान-विज्ञान के साथ इस पुण्यस्थली से जहाॅ जगद्विख्यात वक्ता, प्रवक्ता, अधिवक्ता, नेता, राजनेता, अभिनेता, लेखक, कवि, महाकवि, शायर, नाटककार, चित्रकार, फिल्मकार, शिक्षाविद् कुलपति और उद्योगपतियों ने अपने को सुशिक्षित करके विश्व को अपनी ख्याति से गौरवान्वित किया वहीं न्यायिक क्षेत्र और देशीय तथा अन्तर्देशीय प्रशासनिक क्षेत्रों में भी इतनी बड़ी संख्या में महान् लोगों की कर्मस्थली के रूप में यह विश्वविद्यालय शीर्षस्थ रूप में प्रख्यात है। पूरब के आक्सफोर्ड ;व्गवितक व िजीम म्ंेजद्ध की संज्ञा से विभूषित इस तपःस्थली से अवतरित सरस्वती पुत्रों एवं कर्मयोग की साधना करने वाली ऐसी महाविभूतियों का इस पवित्र प्रांगण में उनकी स्तुति, प्रशंसा व मान-सम्मान के द्वारा विश्व के लिए उनके मूर्धन्य अवदानों को स्मरण करने के लिए यह बृहद् सम्मेलन इस प्रांगण में करने का निश्चय किया गया है।

     इलाहाबाद विश्वविद्यालय पुराछात्र महाकुम्भ के नाम से आयोजित यह विराट सम्मेेलन अखिल विश्व में व्याप्त 130 वर्षों से अपनी प्रतिभा-प्रकर्ष की प्रतिष्ठा से विजयवैजयन्ती फहराने वाली पुराछात्राओं एवं पुराछात्रों को अतिशय आदरपूर्वक सम्मानित करने के लिए आमंत्रित करता है। दिनांक 6, 7 एवं 8 मई सन् 2017 ई0 को आयोजित होने वाले इस इलाहाबाद विश्वविद्यालय पुराछात्र महाकुम्भ में विश्वविद्यालय के हम समस्त अध्यापक, छात्र, विश्वविद्यालय प्रशासन एवं सम्पूर्ण प्रयागवासी आप समस्त पुराछात्राओं और पुराछात्रों का स्वागत और अभिनन्दन करने हेतु कृतसंकल्प हैं।

 

 

FIRST ANNOUNCEMENT

Since the dawn of civilization the hallowed city of Prayag has been hailed as the holiest of the holy places of Hindu pilgrimage. The oeuvre of vedic scriptures extol the significance of this ancient city. From the perspective of religion, philosophy and culture too Prayag has ever been pre-eminent. The Puranas allude to the annual congregation of sages and seers that were convoked under the spiritual leadership of the evolved and prophetic seers like Bhardwaj, Yajnavalkya, Valmiki, Vishwamitra and several others.

Ancient scriptures bear ample testimony to the place offering a platform for intense discussion and debate over humanistic questions in the global perspective. And it is, therefore, by virtue of its concerns in the fields such varied as religion, philosophy, ethics, politics, economics, ayurveda, yoga and sciences that Prayag has attained its exalted position. Since time immemorial the tradition of holding well-spread fairs like Ardhakumbha, Kumbha and the Mahakumbha in the month of Magh has continued incessantly. Staged through the aeons of time these fairs as mega events are unique as they have attracted vast multitudes of humanity with a kind of marvellous spontaneity that offers a rare spectacle in the entire world. Billions of people throng to this consecrated place seeking with solemn prayers a blessed existence for lives both terrestrial and ethereal. Words fall short to foreground the special features of one of the most sacred of cities of the world.

The year 1887 marked the start of a new epoch in the history of this sanctified place with the laying of the foundation of the world renowned temple of higher learning called the University of Allahabad. With the passage of time this institution has produced a galaxy of scholars who earned laurels for the country by their unparallelled genius. The seat of knowledge has the unique distinction of having produced reputed teachers, statesmen, legal luminaries, artistes, writers, poets, playwrights, painters, filmmakers, educationists, vice chancellors and entrepreneurs. While on the one hand these great achievers raised the prestige of the university globally, on the other hand the alumni who excelled in the sphere of law and justice and bureaucracy carved a niche for itself by their excellence.

It is therefore out of the cherished desire of the admirers of this great institution to accord a warm reception and to recognize and honour its distinguished alumni for their notable contribution that a resolve has been made to organize a mega alumni meet in the precincts of this magnificent campus.

With this end in view the event christened “Allahabad Vishwavidyalaya Purachhatra Mahakumbha (Allahabad University Mega Alumni Meet)” has been envisioned on an enormous canvas to host a memorable event to honour its alumni who have spread the acclaim of the university in all corners of the world in all these 130 years of its effulgent history. We the teachers, students, staff and the citizens of the university fraternity, are fully geared to roll out the red carpet to extend a hearty welcome to our very own alumni. 

 

 

 

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